
प्रिय स्वामीजी का हमारे लिए प्यार और उनकी हमारे ऊपर जो रहमत है, उसकी जितनी बात की जाए वो कम है। इसी प्यार का किस्सा यह भी है।
मेरी अमेरिका में तीन महीने पहले नौकरी लगी और मेरी नयी लाइफ वहाँ शुरू हो गयी। मैं रोज़ काम पे जाने के लिए सुबह छह बजे उठ जाता और शाम को छह बजे वापिस आता। खाने पीने का कोई देखने वाला नहीं है इसलिए अगले दिन के खाने की तैयारी मुझे रोज़ लौट कर करनी होती है। स्वामीजी के आशीर्वाद से सब अच्छा चलता है। मेरा खाना बनाने का सामन सब घर पर रहे इसके लिए मैं वीकेंड पे सब तैयारी करके रखता हूँ। ऐसे ही एक दिन जब में यहां के स्टोर पर सामान खरीदने गया तो मेरे मन में आया की शाम को काम से लौटने के बाद चाय और मेथी की मठरी खाने को मिले तो मज़ा आ जाए, पर खूब ढूंढ़ने के बाद भी मुझे मेथी की मठरी नहीं मिल पायी। मैंने मन ही मन कहा “मठरी मिल जाती तो बात बन जाती“। खैर, ये बात आयी गयी हो गयी और में मठरी के बारे में भूल गया। ये सब जुलाई के पहले सप्ताह की बात है।
दिन बीत गए, अगस्त का दूसरा दिन था जब मेरी एक दोस्त की मम्मा, जो स्वामीजी की पुरानी भक्त हैं, उनका अमेरिका आने का प्लान बना। वो आने से पहले स्वामीजी से मिलने गयीं और जाने की अनुमति लेके लौटने लगीं तो स्वामीजी ने उन्हें रोका और कहा ” बेटा वहाँ जाके जब हर्षुल से मिलोगे तो उसे मेरी ओर से मेथी की मठरी दे देना”। आंटी ने मेरी लिए मठरी का पैकेट रख लिया।
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आज (4 अगस्त) मैं जब आंटी से मिला तो उन्होंने मठरी का पैकेट मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा “ये स्वामीजी की ओर से हैं“। पहले मुझे कुछ समझ नहीं आया, फिर अचानक वो दिन याद आया जब मैं दुकान में खड़ा मठरी ढूंढ रहा था, और न मिलने पर निराश हो गया था। जब समझ आया तो आंखों में आंसू आ गए की कैसे स्वामीजी को मेरा इतना छोटा सा ख़याल, जिसे मेने व्यक्त भी नहीं किया था, जिसे में खुद भी भूल गया था… वो भी याद है !!!
स्वामीजी हमारे साथ पल पल हैं, इसका एहसास वे हमे इन छोटी छोटी चीज़ों (जैसे की मेरा मठरी का पैकेट) से कराते रहते हैं।
स्वामीजी के इस प्यार को पाके जितना भी शुक्रिया किया जाए, वो कम है! ऐसे हैं हमारे स्वामीजी!
